नील का धब्बा

चम्पारण देश के पूरब में नेपाल से लगा हुआ बिहार का जिला है जो अब दो हिस्सों पश्चिमी और पूर्वी चम्पारण में बंटा है।

चम्पारण में बेतिय राज, रामनगर आदि कई स्टेट थे। इसमें सबसे बड़ा बेतिया राज था। बेतिया राज का क्षेत्रफल 2000 वर्गमील था । पहले सड़क वगैरह की सुविधा वैसी नहीं थी जैसी आजकल है। अच्छे प्रबंध के विचार से छोटे-छोटे हिस्से ठेकेदारी के दिए जाते थे। उनका काम यह रहता था जो हिस्सा उनकी ठेकेदारी में रहता था, उसकी देखभाल करना और नियत समय पर रैयतों से  मालगुजारी वसूल कर राज में दाखिल करना। पहले कुल ठेकेदार हिन्दुस्तानी थे। 1793 के बाद अंग्रेज, जिनका गन्ना और नील की खेती से अधिक संबंध था, इस काम में आ गए। रियासतों विशेषकर बेतिया राज से ठेका लेकर  गन्ना और नील की खेती प्रारम्भ की।  1888 के बाद उनकी स्थिति काफी मजबूत हो गयी। 1888 में बेतिया राज पर कर्ज हो गयाऔर कर्ज की अदायगी के लिए विलायत से 85 लाख रु. कर्ज लिया गया। कर्ज की शर्त के अनुसार अंग्रेजों को स्थायी ठेका बंदोबस्त करना था  जो  कर्ज की अदायगी के लिए मालगुजारी  दिया करेंगे। इस प्रकार 5.5 लाख रु आमदनी का मुकर्ररी ठेका यानी नियत देय मालगुजारी पर तय स्थायी ठेका 14 कोठी वालों के साथ बंदोबस्त किया गया।  1917 में बेतिया राज के अंदर 36 अंग्रेज ठेकेदार थे जिनमें 23 नील का व्यवसाय करते थे।

नील की खेती दो प्रकार से  होती थी।  जीरात और असामीवार ।

जीरात  : कोठीवालों के पास जो जमीन थी, उसमें वे खुद  नील की खेती करवाते थे । रैयतों को उसके लिए मजदूरी करनी होती थी जिसका वे मामूली मजदूरी-भुगतान करते थे।  वह मालिक की जीरात की जमीन होती थी या उन्होंने काश्तकारी के हक प्राप्त कर लिए होते थे।

असामीवार : इसमें सबसे चर्चित था तीन-कठिया । चम्पारण में 20 कट्ठे का एक बीघा होता है इसमें तीन  कट्ठा नील की खेती नीलहे रैयतों से करवाते थे। 1860  में बीघा में पांच कट्ठा नील की खेती करवाते थे; 1867 से बीघा में तीन कट्ठा हो गया। इसलिए यह तीन-कठिया के नाम से चर्चित हो गयां।

नीलहे रैयतों से नील की खेती जबरन करवाते थे। तीन-कठिया व्यवस्था किसानों पर बहुत बड़ा बोझ थी।  नीलहे रैयतों की सबसे अच्छी जमीन पर नील की खेती  करवाते थे। खेत का चयन वे स्वयं  करते थे। किसी कारण से फसल ठीक नहीं हुई तो उसका हर्जाना उन्हें  भरना पड़ता था। रैयत नील की खेती करने के लिए मजबूर था। तीन-कठिया व्यवस्था रैयतों के लिए अभिशाप थी। नील की खेती के कारण रैयतों का अपना  कृषि कार्य बाधित होता था। । कोई उनकी सुनने वाला नहीं था।  नीलहे किसानों पर तरह-तरह के अत्याचार करते थे।  वे उससे मुक्ति के लिए छटपटा रहे थे। कोठी वाले  रैयतों से कई प्रकार के टैक्स भी वसूलते थे। जैसे पइन, शरहबेशी , तवान, हुण्डा, सलामी, बपही-पुतही, सगोड़ा, बेचाई, फगुअही,दसहरी,चैतनौमी, दावातपूजा, हथियही,घोड़ही, मोटरही,रसीदावन, फरकावन,मड़वच आदि।

इस अत्याचार के खिलाफ यदा कदा विरोध के स्वर भी उठते रहे , कभी-कभी हिंसा भी हुई मगर उसे दबा दिया जाता था। रैयतों को कभी न्याय नहीं मिला। इस अत्याचार को समाप्त करने का बीड़ा उठाया सतवरिया बेलवा कोठी के किसान पं. राजकुमार शुक्ल ने। उनके साथ जुड़ गए शीतल राय, शेख गुलाब और लोमराज सिंह आदि। इसके लिए उन्होने प्रशासन एवं न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, मगर वहाँ   उन्हे न्याय नहीं मिला। उन्होने काँग्रेस के नेताओं से सम्पर्क किया मगर वे उन्हे चम्पारण लाने में कामयाब नहीं हुए। इधर बेलवा कोठी के नीलहे एम्मन का अत्याचार चरम पर था। राजकुमार शुक्ल की बेटी की शादी से एक दिन पूर्व उसने उनका घर लूट लिया,खेत की फसल बर्बाद कर दी। मगर शुक्ल जी ने इस उत्पीड़न को सहते हुए  भी अपना अभियान जारी रखा। इसी क्रम में वे प्रताप के संपादक  गणेश शंकर विद्यार्थी जी से कानपुर में मिलते हैं। विद्यार्थी जी  ने उन्हें बताया कि गांधी जी गरीबों के लिए काम करते है। आप उनसे मिलिए। यही से प्रारम्भ हो जाता है गांधी जी को चम्पारण लाने का अभियान । राजकुमार शुक्ल गांधी जी से मिलने साबरमती आश्रम जाते हैं मगर वहाँ उनकी मुलाकात गांधी जी से नहीं होती है। वे गांधी जी से 1916 में काँग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में मिलते है।। गांधी जी उनकी बात गौर से सुनते हैं, मगर स्वयं स्थिति को जाने बगैर कुछ करने में असमर्थता जाहिर करते हैं। पुन: उनकी मुलाकात कानपुर में होती है। गांधी जी उनसे मार्च/ अप्रैल तक चम्पारण आने का वादा करते हैं।

गांधी जी मार्च के महीने में राजकुमार शुक्ल को कलकत्ता में आकर मिलने का पत्र देते है। मगर पत्र विलम्ब से मिलने के कारण, जब तक राजकुमार शुक्ल  कलकत्ता पहुंचते, उससे पहले  ही गांधी जी वहाँ से जा चुके होते हैं। वापस लौटने पर उन्हे अप्रैल में कलकत्ता में भूपेन बाबू के घर पर मिलने का गांधी जी का तार  मिलता है । शुक्ल जी गांधी जी के कलकत्ता पहुंचने से पहले ही भूपेन बाबू के घर पर पहुंच जाते हैं, जिसका उल्लेख  गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में इस प्रकार किया है :  “कलकत्ते में भूपेन बाबू के यहाँ  मेरे पहुंचने से पहले उन्होने वहाँ डेरा डाल दिया था। इस अपढ़ , अनगढ़ परन्तु निश्चयवान किसान ने मेरा दिल जीत लिया।” 9 अप्रैल 1917 को गांधी जी ने राजकुमार शुक्ल के साथ कलकत्ता से पटना के लिए प्रस्थान किया। पटना पहुंच कर राजकुमार शुक्ल गांधी जी को डा. राजेन्द्र प्रसाद के घर पर ले गए। राजेन्द्र प्रसाद उस समय घर पर नहीं थे। घर पर उनका सेवक था। राजकुमार शुक्ल के पूरा समझाने के बाद भी सेवक ने गांधी जी को अन्दर का शौचालय इस्तमाल करने से मना कर दिया। इस घटना के बारे में गांधी जी ने आत्मकथा में लिखा ” पटना की मेरी पहली यात्रा थी। वहाँ किसी के साथ मेरा कोई परिचय नहीं था, जिससे उनके  घर उतर सकूं।  मैंने सोच लिया था राजकुमार अनपढ़ किसान है , तथापि उसका कोई वसीला तो होगा ही। ट्रेन में मुझे उनकी कुछ जानकारी  मिलने लगी थी। पटना में उनका पर्दा खुल गया। राजकुमार शुक्ल की बुद्धि निर्दोष थी। उन्होंने जिन्हें अपना मित्र मान रखा था वे वकील उनके मित्र नहीं थे, बल्कि राजकुमार शुक्ल उनके आश्रित थे। किसान मुवक्किल और वकील के बीच चौमासे की गंगा के चौड़े पाट के बराबर का अंतर था।”   गांधी जी ने लिखा है कि इस घटना से राजकुमार शुक्ल के प्रति उनका सम्मान बढ़ गया।

पटना में गांधी जी मजरुल हक से मिले जिनसे  परिचय गांधी को  लंदन में बैरिस्ट्री की पढाई  के दौरान हो गया था और 1915 में भी मुम्बई में  उनसे मुलाकात  हुई थी। और उसी दिन शाम को वे  मुजफ्फरपुर के लिए प्रस्थान कर गए। मुजफ्फरपुर में जे बी कृपलानी को उन्होंने तार दे दिया था जिनके साथ उनका पहले से संवाद था। प्रो. कृपलानी ग्रियर्सन भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज ( अब लंगट सिंह कॉलेज) मुजफ्फरपुर में प्राध्यापक थे। कृपलानी जी अपने छात्रों को लेकर स्टेशन पर गांधी जी के स्वागत के लिए पहुंचे। पर गांधी जी को नहीं पहचानने के कारण खोज नहीं पाए। भीड़ को देखकर राजकुमार शुक्ल ने अनुमान लगाया कि वे गांधी जी के स्वागत के लिए आए हैं,फिर उन्होंने  उन्हें  गांधी जी से मिलवाया । रात को लगभग एक बजे गांधी जी कॉलेज पहुंचे। गांधी जी प्रो. मलकानी के आवास पर ठहरे। 11 ता. को गांधी जी बिहार प्लान्टर्स एसोसिएशन के मंत्री जे एम विलसन से मिले और अपने आने का उद्देश्य बताया और जाँच में सहयोग मांगा। मगर मि. विलसन का रुख नकारात्मक था। 12 ता. को गांधी जी मुजफ्फरपुर के मित्रों के सुझाव पर छात्रावास से गया प्रसाद सिंह वकील के आवास पर चले गए।

13 ता. को तिरहुत डिविजन के कमिश्नर एल एफ मोर्शेड से मिले और उन्हे अपने आने का मकसद बताया और जाँच में सहयोग का अनुरोध किया। मोर्शेड ने गांधी जी को बताया कि सरकार की तरफ से जाँच हो रही है, आपका आना अनावश्यक है। उन्होंने जानना चाहा कि आपको किसने बुलाया है।  उन्होंने  गांधी जी से वापस जाने को कहा । 14 ता. को गांधी जी ने तय किया कि 15 ता. दिन रविवार को दोपहर की  ट्रेन से मोतिहारी जायेगे। 15 ता. को गांधी जी रामनवमी प्रसाद , धरणीधर बाबू और गोरख प्रसाद के साथ मोतिहारी चले गए। वहाँ वे गोरख प्रसाद के घर पर ठहरे। जसवलीपट्टी के किसान  पर बहुत अत्याचार की जानकारी गांधी जी को थी। इसलिए 16 अप्रैल को सुबह 9 बजे गांधी जी रामनवमी प्रसाद और धरणीधर बाबू के साथ हाथी से जसवलीपट्टी के लिए निकले। 9 कि मी चलने के बाद चन्द्ररहिया गाँव 12 बजे  दिन में पहुंचे। वहाँ  पुलिस के एक दरोगा ने गांधी जी से कहा कि कलेक्टर ने आपको सलाम किया है। वहाँ से गांधी जी उसके साथ मोतिहारी लौट आए। रामनवमी प्रसाद और धरणीधर बाबू को जसवलीपट्टी जाकर जाँच पूरा करने और आवश्यक हो तो रात में वहाँ ठहर जाने  का निर्देश दिया। रास्ते में उन्हे उप पुलिस अधीक्षक मिला, उसने उन्हें एक नोटिस दिया, जिसे गांधी जी ने शांतचित्त से पढा।मोतिहारी आकर उसका जवाब जिलाधिकारी के पास भेजा। उस नोटिस में गांधी जी की उपस्थिति से जिले में शांति भंग होने,उपद्रव फैलने की बात कही गयी थी; उनके आने का उद्देश्य आन्दोलन करना है। उन्हें  तत्काल जिला छोड़ने का निर्देश दिया गया था।

गांधी जी ने अपने जवाब में इस बात का खण्डन किया कि उनका उद्देश्य आन्दोलन करना है। उन्होंने  यह बात भी मानने से इन्कार किया कि उनकी उपस्थिति से जिला में शांति भंग होगा या दंगा हो सकता है। उन्होंने लिखा कि उनका उद्देश्य नीलहे और  रैयतों में जो अनबन चल रही  है उसको जानना और नीलहों एवं रैयतों के बीच सौहार्द स्थापित करने में मदद करना है। 17 ता. को  अगले दिन मोतिहारी से 16 मील दूर परसौनी गाँव  जाना तय हुआ। इसकी जानकारी गांधी जी ने जिलाधिकारी को शाम में पत्र द्वारा दे दी। उसके तुरन्त बाद गांधी ने को  सम्मन प्राप्त हुआ जिसमें धारा 188 के तहत मुकदमा चलना था और  उन्हे 18 ता. को कोर्ट में उपस्थित रहना था।  गांधी जी  ने सारी रात जगकर आगे की कार्रवाई की तैयारी की। एक पत्र कमिश्नर के  नाम तथा दूसरा बिहार प्लान्टर्स एसोसिएशन के मंत्री के लिए  तैयार किया। इसमें अब तक हुई जाँच की जानकारी भी संलग्न थी । इस पत्र को गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद दिया जाना था। रात में ही सम्मन का जवाब  भी तैयार कर लिया गया । गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद आगे की कार्रवाई चलाने के  आवश्यक दिशा निर्देश राम नवमी प्रसाद और धरणीधर बाबू  को दिये, जिन्होंने  गांधी जी की  गिरफ्तारी के बाद कार्रवाई को जारी रखने और आवश्यकता होने पर जेल जाने का निश्चय किया था।  तार से एच एस पोलक,मदन मोहन मालवीय, डा. राजेन्द्र प्रसाद और देश के अन्य नेताओं को इसकी जानकारी दी गयी।  गांधी जी ने उन चीजों को , जिन्हे वे जेल में ले जाना चाहते थे ,एक जगह कर के ,बाकी चीजों को दूसरी जगह रख दिया। इस दिन इजहार लिखने का कार्य बंद रहा।

18 अप्रैल को गांधी जी रामनवमी प्रसाद और धरणीधर बाबू के साथ  निर्धारित समय पर कोर्ट पहुंचे।  इसके बारे डा. राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी किताब  “चम्पारण में महात्मा गांधी” में  लिखा, ” 18 अप्रैल ,1917  चम्पारण के इतिहास में ही नहीं, वरन भारत वर्ष के वर्तमान इतिहास में बड़े महत्त्व का दिन है,…….. । इसी दिन  भारत के वर्तमान इतिहास में सत्याग्रह का पवित्र एवं ज्वलंत उदाहरण मिलने वाला है , जिसमें  समस्त भारतवर्ष की आँखे खुलने वाली है। ‘साँच को आँच नहीं ‘  —  यह हमारे देश की एक  पुरानी  कहावत है ; पर इसको चरितार्थ कर महात्मा गांधी संसार को इसकी सत्यता सिद्ध करने वाले है।”   यद्यपि धारा 144 का नोटिस तथा मुकदमे की बात रैयतों से नहीं कही गयी थी, फिर भी दूर-दूर देहातों से  हजारों रैयत कचहरी में आकर प्रतीक्षा कर रहे थे। कचहरी में जब गांधी जी गए तो उनके पीछे – पीछे  लगभग दो हजार मनुष्यों ने घुसने की कोशिश की ,जिससे  कचहरी के दरवाजे के शीशे टूट गए।

जब गांधी जी कोर्ट में पहुंचे तो जज ने उनसे पूछा आपका कोई वकील है? गांधी जी ने उत्तर दिया कोई नहीं ।  सरकारी वकील ने अभियोग  पढ़ सुनाया और कहा कि धारा 144 के  नोटिस के अनुसार मि. गांधी को 16 अप्रैल को रात की गाड़ी से चम्पारण छोड़ कर  चला जाना  चाहिए था,किन्तु अभी तक नहीं गए हैं ; इसलिए उनपर धारा 188 के तहत अभियोग लगाया जाता है।  इस पर गांधी जी ने कहा कि ” मैंने नोटिस पाने के बाद एक पत्र जिला मजिस्ट्रेट के पास भेजा था, जिसमें उस आज्ञा  के उल्लंघन का कारण बताया था, उस पत्र को मिसिल में शामिल कर लिया जाय।” इसके बाद गांधी जी ने अपने  बयान को  बहुत शांत, किन्तु दृढ़  भाव से पढ़ सुनाया।  प्रस्तुत है बयान के कुछ अंश।

ऐसा दिखाई पड़ने में कि सी आर पी सी की धारा  144  के तहत जारी आदेश को न मानकर  मैंने बहुत गम्भीर कदम उठाया है, इस संदर्भ में मैं अदालत की इजाजत से अपने नजरिये  को समझाते हुए एक संक्षिप्त बयान देना चाहूंगा। मेरी विनम्र राय के मुताबिक यह स्थानीय प्रशासन और मेरे बीच मतभिन्नता (अलग-अलग राय ) का सवाल है। इन्सानियत की  और देश की  सेवा  करने के उद्देश्य से  ही मैं देश में वापस आया हूँ। रैयत जो जोर देते हैं कि उनके साथ नीलवरों द्वारा न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं हो रहा है , उनके द्वारा यहाँ आने और उसकी मदद करने के आग्रही निमंत्रण के प्रत्युत्तर में मैंने वैसा ही किया है। इस समस्या को ध्यान से समझे-बूझे बिना मैं कोई मदद नहीं दे सकता था। इसलिए मैं, यदि  संभव हो , तो प्रशासन और  नीलवरों की मदद से इसकी जाँच करने यहाँ आया हूँ। ……  मैं किसी भी तरह से मुझे दी जाने वाली सजा को कम करने के लिए यह बयान देने का साहस नहीं कर रहा हूँ ,  बल्कि यह दिखाने के लिए  कि मैंने दिए गए  आदेश की अवहेलना  कानूनी  प्राधिकार के प्रति सम्मान की कमी के कारण नहीं की, वरन हमारे अस्तित्व के  ज्यादा ऊँचे कानून – अन्त: करण(विवेक) की आवाज  के आदेश का पालन करने के लिए की है।”

न तो  गांधी जी के सहयोगी वकील  और न ही मैजिस्ट्रेट  जार्ज चन्दर  को यह कल्पना थी कि गांधी जी ऐसा बयान देंगे। इस बयान को सुनकर अदालत थर्रा गयी और मैजिस्ट्रेट की समझ में यह नहीं आया कि अब क्या करें? उन्होंने   गांधी जी से बार-बार पूछा कि  आप अपराध स्वीकार करते हैं कि नहीं?  गांधी जी उत्तर दिया कि ‘  मुझे जो कुछ कहना था , मैंने  अपने बयान में कह दिया।’  इस पर जज ने कहा कि उसमें अपराध का साफ इकरार नहीं है। गांधी जी ने कहा कि ‘ मैं अदालत का अधिक समय नष्ट करना नहीं चाहता, मैं अपराध स्वीकार कर लेता हूँ।’ इस पर जज और भी घबरा गया उन्होने गांधी जी से कहा कि  ‘  यदि आप अब भी जिला छोड़ कर चले जायँ और न आने का वादा करें , तो तो यह मुकदमा उठा लिया जायेगा?” इस पर गांधी जी ने उत्तर दिया , “यह हो नहीं सकता । इस समय की कौन कहे , जेल से निकलने पर भी मैं चम्पारण में ही अपना घर बना लूँगा।” जज यह दृढ़ता  देख अवाक हो गए और उन्होने कहा कि “इस विषय में कुछ विचार करने की आवश्यकता है। आप 3 बजे यहाँ आइए, तो मैं हुक्म सुनाऊँगा।” इसके बाद गांधी जी पुलिस के सुपरिण्टेण्डेण्ट से मिले उसने राजकुमार शुक्ल की बहुत शिकायत की और कोठी वालों से  गांधी जी की मुलाकात  कराने का वादा किया। गांधी जी जिला मैजिस्ट्रेट डब्यू. बी. हिकॉक  से भी मिले। मैजिस्ट्रेट ने तीन दिनों तक देहातों में जाना बंद करने के लिए कहा जिसे गांधी जी ने मान लिया।

तीन बजे गांधी जी कोर्ट में पहुंचे तो मैजिस्ट्रेट ने कहा कि इस विषय में अभी और विचार करने की आवश्यकता है फैसला 21 ता. को सुनाऊंगा। तब तक आप सौ रु. की  जमानत ले लीजिए। गांधी जी ने कहा कि न मेरा कोई जमानतदार है और न  मैं जमानत लूंगा।  अंत में उसने स्वयं  मुचलका दे कर उन्हें जाने की आज्ञा दी।  इसके बाद गांधी जी वापस निवास स्थान पर पहुंचे। आज की कार्रवाई सब मित्रों और समाचार पत्रों को भेजी गई। साथ ही सबसे कहा गया कि जब तक सरकारी आज्ञा मालूम नहीं हो जाय तब तक किसी प्रकार का आन्दोलन नहीं करना चाहिए।  18 ता. को मि. पोलक, मजरुल हक, ब्रज किशोर प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, शम्भू शरण और डा. राजेन्द्र प्रसाद  मोतिहारी पहुंचे। सब लोगों ने यह फैसला किया कि गांधी जी को किसी प्रकार की सजा हुई तो काम जारी रखना है और आवश्यकता हुई तो वे जेल जाने के लिए भी तैयार हैं। तय यह हुआ कि गांधी जी जेल गए तो मि. हक और ब्रज किशोर प्रसाद  इस दल के नेता बनेंगे और इसकी सूचना सरकारी कर्मचारी को दे दी जाय । इसके बाद धरणीधर बाबू और रामनवमी प्रसाद इस कार्य को लें। जब वे भी हटा दिए जाएं तब राजेन्द्र प्रसाद  और शम्भू शरण बाबू और अनुग्रह नारायण सिंह इस काम को जारी रखेंगे। आशा की गई इन तीन दलों के हटते-हटाते और लोग भी आ जाएंगे और उनके आने पर आगे का कार्यक्रम ठीक कर लिया जायेगा।

19 ता. को बड़ी संख्या में रैयत आने लगे और उनका बयान गांधी जी के सहयोगी लिखने लगे। इस बात का पूरा ध्यान रखा गया जिरह करके जो बात सच्ची लगे सिर्फ उसे ही लिखना है। 19  ता. को देश के भिन्न-भिन्न प्रान्तों से बहुत से तार आए। अब तक की जो कार्रवाई हुई थी गांधी जी ने उसका सार सब मित्रों के पास भिजवा दिया।  उसी दिन दोपहर को सी. एफ. एन्ड्रयूज मोतिहारी पहुंचे। । उधर पटना में मि पोलक ने बिहार प्रांतीय सभा की बैठक में भाग लिया । उन्होने चम्पारण का सब हाल सुनाया और नेताओं से चम्पारण जाने का अनुरोध किया। इस बैठक में यह तय हुआ कि गांधी जी को हर प्रकार की सहायता दी जायगी।  20 अप्रैल को मि एन्ड्रयूज मोतिहारी के कलेक्टर से मिले। वहाँ उन्हें मालूम हुआ कि मुकदमा उठा लिया जायेगा और सरकारी अधिकारी जाँच में गांधी जी की मदद करेंगे। शाम सात बजे गांधी जी को मुकदमा उठा लेने की नोटिस आ गया।

22 अप्रैल को गांधी जी बाबू ब्रज किशोर प्रसाद और रामनवमी प्रसाद के साथ तीन बजे की ट्रेन से बेतिया गए। । बाबू धरणीधर प्रसाद, डा. राजेन्द्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, शम्भू शरण वर्मा  और राम बहादूर राय  मोतिहारी में रह गए। 22 ता. को मुजफ्फरपुर और छपरा से कई वकील मदद के लिए आए। मुजफ्फरपुर से रामदयालु सिंह आए और इजहार लिखने में मदद की।  पाँच बजे ट्रेन बेतिया पहुंची। स्टेशन पर गांधी जी के स्वागत के लिए  अपार भीड़ उपस्थित थी। भीड़ इतनी अधिक थी कि ट्रेन को स्टेशन से थोड़ा पहले ही रोक देना पड़ा। जय-जयकार से आकाश गूंज उठा और खूब पुष्पवृष्टि की गयी। 24 ता. से इजहार लिखे जाने लगे। जैसे-जैसे जाँच का काम आगे बढ़ रहा था  नीलवरों और प्रशासन  की घबराहट बढती जा रही थी। वे इस बात की पूरी कोशिश कर रहे थे कि किसी प्रकार से जाँच का काम रुक जाय। इसी क्रम में बिहार प्लान्टर्स एसोसिएशन के मंत्री एवं स्थानीय प्रशासन ने जाँच के संबंध में अपनी रिपोर्ट सरकार के पास भेज दी। गांधी जी को 6 मई को एक टेलीग्राम मिला जिसमें 10 मई को पटना में उन्हे डब्लू मौड से मिलना था।

10 मई को गांधी जी मि. मौड से मिले। यह वार्ता दो घन्टे चली। उसने गांधी जी से अपने सहयोगियों को चम्पारण से हटाने का सुझाव दिया जिसे गांधी जी ने माने से इनकार कर दिया। मौड के सुझाव के अनुसार अब तक हुई जाँच की संक्षिप्त रिपोर्ट 12 मई को उनके पास भेज दी गई। जाँच तो जारी रही  मगर अब रैयतों के संक्षिप्त बयान लिए जाने लगे जिससे काम कुछ हलका पड़ गया और सबूतों को देखने का मौका मिल गया। इस बीच गांधी जी को 4 जून को छोटे लॉट एडवर्ड गेट से  राँची में मिलने का बुलावा आया।

4-6 जून तक  राँची में  गांधी जी की सर एडवर्ड गेट और उनके काउन्सिल के सदस्यों के साथ बातचीत होती रही । अंत में एक जाँच कमेटी  मि. एफ सी स्लाई ,आई सी एस , कमिश्नर मध्य प्रान्त की अध्यक्षता में बनाने का निश्चय हुआ जिसमें  गांधी जी भी सदस्य  बनाए गए। कमेटी के काम निम्नलिखित तय किए गए:-

  1. चम्पारण जिले के जमींदारों और रैयतों के बीच संबंध के सभी विवादों के विषय में जाँच करना।
  2. इन सब विषयों में जो सबूत मौजूद हैं उसकी जाँच परख करने के लिए स्थानीय या कोई अन्य ,जैसी जरूरी हो आगे की जाँच करना।
  3. अपनी जाँच के परिणाम को सरकार के सामने पेश करना । जो शिकायतें या कुप्रथाएँ प्रचलित है, उनके निपटारे की सिफारिश करना।

जाँच – कमेटी  नियुक्त होने के बाद रैयतों का 12 जून से इजहार लेना बंद कर दिया गया। 13  जून को एक  पत्र मि. मैकफर्सन को भेजा गया जिसमें उन्हें सूचित किया गया था कि  रैयतों का बयान  लिखना बंद कर दिया गया है , पर तो भी उनका आना- जाना बंद नहीं होगा।  पत्र में यह  भी उल्लेख किया गया था कि उन्हें  यह कह दिया गया था कि  जाँच होने तक वे शांतिपूर्ण रहें और कानून के विरूद्ध कोई काम न करें। 16 जून को गांधी जी बम्बई चले गए और उनके  सहयोगी मोतिहारी ।  गांधी जी की अध्यक्षता में 5000  रैयतों का पूरा और 8000  रैयतों का संक्षिप्त बयान लिया जा चुका था। चम्पारण जिले में कुल 2841 गाँव थे जिसमें से 850 गाँवों के रैयतों ने अपने बयान दिए थे।  कमेटी द्वारा संबंधित पक्षों के बयान आमंत्रित करने के जबाव में बिहार प्लान्टर्स एसोसिएशन, दो कोठियों के मैनेजर, 25 रैयत, बेतिया राज के मैनेजर जे. टी. विटी,  सेटलमेण्ट अधिकारी जे. ए. स्वीनी, बेतिया के सब डिविजनल मैजिस्ट्रेट डब्लू.  एच. लेविस, भूतपूर्व सब-डिविजनल ऑफिसर मि. ई. एच. जॉनसन ने बयान लिखकर कमेटी के पास भेजा।

17  जुलाई सें बेतिया में गवाही का इजहार आरम्भ हुआ। 17  जुलाई से 23 जुलाई के बीच कमेटी की पाँच बैठके हुई, जिसमें मि. स्वीनी, मि. लेविस, मि. विटी,  राजकुमार शुक्ल, संत राउत, खेन्धर राय, डब्लू. जे. रौस, मि एच. गेल, मि ए. सी. एम्मन एवं मि. सी. स्टील की गवाही हुई।। 25 जुलाई से मोतिहारी में बैठक प्रारम्भ हुई, जिसमें  चम्पारण के कलक्टर  डब्लू.  बी. हिकॉक,प्लान्टर्स असोसिएशन के प्रतिनिधि जे. बी. जेमसन , मि. सी. स्टील , राजापुर कोठी के मैनेजर मि. ई. ए. हडसन,  मोतिहारी कोठी के मैनेजर डब्लू. एस. इरविन के बयान हुए। 28 जुलाई को परसा कोठी में तहकीकात की गई। 29 जुलाई को कुडि़या कोठी और उसके  देहात में जा कर जाँच की गई। कम्टी की कार्रवाई 14 अगस्त तक चली जिसमें तहकीकात की गई और देहात मे जा कर जाँच पड़ताल की गई।

4 अक्टूबर  1917 को जाँच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट  सरकार के पास भेज दी। सरकार ने कमेटी की प्रायः सभी बातों को मंजूर कर 18 अक्टूबर  को इसे प्रकाशित कर दिया। उसके कुछ मुख्य अंश इस प्रकार हैं :-

  1. तीन- कठिया प्रथा चाहे नील बोने के लिए हो,या कोई  और गल्ला पैदा करने के लिए, पूर्ण रूप से उठा दी जाय।
  2. मोतिहारी और पिपरा कोठियों में जो शरहबेशी हुई है, उसमें फी सैकड़ा 26 रु. कम हो जायेगा। तुरकौलिया कोठी में फी सैकड़ा 20 रु. कम होगा।
  3. जिन रैयतों ने कोठियों में तावान दिया है उनको उस तावान का 25 फीसदी कोठी से वापस मिलेगा।
  4. अबवाब लेना पूर्णत: कानून के विरुद्ध है और भविष्य में  किसी रैयत को अपनी खतिहान में दर्ज की हुई मालगुजारी के सिवा और कुछ भी जमींदार को नहीं देना चाहिए।
  5. मवेशियों के चरने के लिए गोचर या परती भूमि रखने के लिए सब जमींदारों , मुकर्ररीदारों  और ठेकेदारों के पास खबर भेजी जायेगी।……….. आदि।

इस प्रकार चम्पारण से नील का धब्बा धुल सका । चम्पारण सत्याग्रह भारतीय संग्राम में मील का पत्थर साबित हुआ।  यह भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का स्वर्णिम अध्याय है। इसने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की दिशा बदल दी । भारत के प्रथम राष्ट्रपति  डा. राजेन्द्र प्रसाद के अनुसार स्वराज्य का असली बीजारोपण  तो चम्पारण में हुआ। स्वयं महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा  सत्य के प्रयोग मे लिखा है कि “चम्पारण का यह दिन मेरे जीवन का कभी न भूलने जैसा था। मेरे लिए और किसानों के लिए यह उत्सव का दिन था। सरकारी कानून के अनुसार मुझ पर मुकदमा चलाए जाने वाला था। पर सच पूछा जाय तो मुकदमा सरकार के विरुद्ध था। कमिश्नर ने मेरे विरुद्ध जो जाल बिछाया था, उसमें उसने सरकार को ही फंसा दिया था। मैंने वहाँ ईश्वर का,अहिंसा का और सत्य का साक्षात्कार किया। सारे हिन्दुस्तान को सत्याग्रह अथवा कानून के सविनय भंग का पहला स्थानीय पदार्थ-पाठ मिला। पूरे अखबार में इसकी खूब चर्चा हुई और चम्पारण और मेरी जांच को अनपेक्षित रीति से प्रसिद्धि मिल गयी।”

एक तरह से चम्पारण सत्याग्रह  खेती के  व्यापारीकरण के लिए  औद्योगिकीकरण के खिलाफ भी आन्दोलन था । आज  सरकार की गलत नीति और खेती में मशीन के अत्यधिक उपयोग के कारण किसानों की स्थिति अत्यन्त दयनीय है । आजादी के सत्तर साल हो रहे हैं । इन सत्तर सालों में जो खेती-किसानी की तस्वीर उभरी है वह अत्यन्त चिंताजनक है। पहले किसान खुद को मार रहे थे, जहर खा कर, अब गोली खा कर मर रहे हैं। यह दु्र्भाग्यपूर्ण है कि हमारे अन्नदाता, राष्ट्र निर्माता दीन-हीन बेसहारा हो बहुत ही खराब स्थिति में जीने को बाध्य  हैं। खेती आज घाटे का सौदा हो गया है। जिस कारण आज किसान का  कोई बेटा किसान बनना नहीं चाहता। यह हम सब के लिए विचारणीय विषय है। चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी  एक अवसर है कि हम देश में किसानों की स्थिति पर पर उचित विमर्श खड़ा करें, तथा  खेती-किसानी की प्रतिष्ठा एवं समृद्धि को फिर से बहाल करने की सचेष्ट कोशिश करें ।

अशोक भारत

मो. 9430918152

bharatashok@gmail.com

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