चम्पारण सत्याग्रह के नायक थे राजकुमार शुक्ल

चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में प्रकाशित  ‘सौ साल पहले चम्पारण का गांधी’ पुस्तक   पर एक  परिचर्चा  17 अगस्त 2017 को युवा संवाद अभियान एवं राष्ट्रीय सेवा योजना , लंगट सिंह महाविद्यालस के संयुक्त तत्वावधान में  बी बी ए सभागार, लंगट सिंह महाविद्यालय, मुजफ्फरपुर में आयोजित की गई। इस परिचर्चा में अनिल प्रकाश, लेखक एवं पर्यावरणविद्, डा. सरोज कुमार वर्मा, दर्शन  शास्त्र विभाग , बी आर ए बिहार विश्वविद्यालय, डा. रमेश कुमार गुप्ता, हिन्दी विभाग, राम दयालु सिंह महाविद्यालय, डा प्रमोद कुमार, हिन्दी विभाग, लंगट सिंह महाविद्यालय एवं लेखिका सुजाता ( डा. सुजाता चौधरी) ने भाग लिया।

विषय प्रवेश अशोक भारत, संयोजक युवा संवाद अभियान ने कराया। उन्होने कहा कि यह पुस्तक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक  दस्तावेज एवं  संग्रहणीय उपन्यास है। इस उपन्यास में पं. राजकुमार शुक्ल के संघर्षशील व्यक्तित्व को लेखिका ने बहुत ही संजीदगी से उभारा है। राजकुमार शुक्ल के अथक प्रयास एवं दृढ निश्चय के कारण गांधी जी चम्पारण आ सके। जिसके बारे में डा. राजेन्द्र प्रसाद का मानना है कि स्वराज्य का असली बीजारोपण तो चम्पारण मे हुआ। स्वयं गांधी जी ने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग में लिखा है कि मेरे लिए यह कभी न भूलने वाला दिन था। यहाँ मैंने सत्य, अहिंसा और ईश्वर के दर्शन किए। मगर इतिहास में राजकुमार शुक्ल को  वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। सुजाता जी ने इस कमी को इस उपन्यास के माध्यम से पूरा करने  का प्रयास किया है, जिसमें वे सफल रही हैं।

अनिल प्रकाश ने कहा कि चम्पारण सत्याग्रह पर यह पहली साहित्यिक कृति है। राजकुमार शुक्ल के जीवन के विभिन्न पहलुओं का बड़ा ही रोचक एवं जीवंत चित्रण इस उपन्यास में पढने को मिलता है। भाषा सरल एवं प्रवाहपूर्ण है जो पुस्तक को पुन: पढने की प्रेरणा देती है। डा. सरोज कुमार वर्मा ने पुस्तक के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होने कहा कि मेरी जानकारी में राजकुमार शुक्ल पर यह पहली किताब है। भाषा और शिल्प प्रशंसनीय है।  उन्होने कहा कि राजकुमार शुक्ल पर उपन्यास है मगर आवरण पर उनका चित्र न होना खटकता है।

डा. रमेश गुप्ता ने कहा कि किसी ऐतिहासिक चरित्र या व्यक्तित्व पर  केन्द्रित  एक जीवनीपरक उपन्यास लिखने के खतरे होते हैं । मौजूद तथ्यों में फेरबदल की गुंजाइश नहीं होती। अपनी कल्पना-सीमा का विस्तार कर उस युग और परिस्थति  में पहुंचना पड़ता है कि उस व्यक्तित्व का मानस कैसा होगा। इस मामले में ‘ सौ साल पहले चम्पारण का गांधी’ अपनी कसौटी को पूरा करता है। डा. प्रमोद कुमार ने कहा कि  राजकुमार शुक्ल चम्पारण सत्याग्रह के सूत्रधार थे। किसी उपन्यास के लिए लेखकीय आशय एवं ब्यौरा महत्वपूर्ण होता है । उपन्यास पढने से लेखकीय आशय स्पष्ट नहीं होता। इस उपन्यास में लेखिका ने स्त्री पक्ष को उभारा है इसलिए बधाई की पात्र हैं।

लेखकीय हस्तक्षेप में सुजाता जी ने कहा कि राजकुमार शुक्ल के बारे में बहुत सारी बातेों की  जानकारी नहीं है।  इसे जानने के लिए उनके परिवार से मैंने सम्पर्क किया।उनके परिवार के सदस्यों विशेषकर महिलाओं ने ऐसे अनछुए पहलुओं को बताया , जिसका लोगों को अभी तक पता नहीं है , किताब में इसका जिक्र है। उन्होने ने कहा कि ‘ सौ साल पहले चम्पारण का गांधी’ शीर्षक इसलिए चुना गया, क्योकि राजकुमार शुक्ल ही चम्पारण के गांधी थे। चम्पारण सत्याग्रह के गांधी जी यदि महानायक थे तो राजकुमार शुक्ल उसके नायक थे। उन्होने जो संघर्ष किया वह आज भी प्रासंगिक है।

कार्यक्रम के प्रारंम्भ में  डा. जयकान्त सिंह  ‘ जय’ ,भोजपुरी के विभागाध्यक्ष एवं राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम पदाधिकारी ने  अतिथियों एवं उपस्थित सभी लोगों का स्वागत किया। डा. पुष्पा कुमारी, इतिहास विभाग ने शॉल ओढाकर  सुजाता जी का सत्कार किया। बाबा आमटे पर्सनालिटी डेवल्पमेंट केन्द्र के निदेशक राम बाबू भक्ता ने’ जय जगत पुकारे जा’  गीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डा. अनिल कुमार सिंह, उप प्राचार्य ने की। संचालन डा. गजेन्द्र कुमार , विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग ने किया।  धन्यवाद ज्ञापन डा. बी एस झा ने किया। कार्यक्रम में  डा. विजय कुमार जायसवाल, सुरेन्द्र कुमार , अरविन्द वरुण, डा. मंजरी वर्मा, डा़ के के झा , डा. शिव दीपक शर्मा, डा. शैल कुमारी, डा. रत्नेश कुमार, डा. राम बालक चौधरी, डा. रणधीर वर्मा, डा. गोपालजी, हेम नारायण विश्वकर्मा, सोनू सरकार, मो. शाहिद सहित बड़ी संख्या में प्राध्यापक एवं छात्र  उपस्थित थे।

 

अशोक भारत

मो.  9430918152

bharatashok@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *