भगत सिंह और आज का भारत

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लम्बे इतिहास के कई कई पड़ाव और मोड़  रहे हैं,जिनसे गुजरते हुए  देश 1947 में आजाद हुआ।इस इतिहास में क्रांतिकारियों का विशिष्ट स्थान है। बंगाल के एक युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस ने 1908 में ब्रिटिश साम्राज्य की छाती पर पहला बम मुजफ्फरपुर, बिहार में फोड़ा था ।खुदीराम बोस के सर्वस्व बलिदान ने देश में क्रांतिकारी धारा को गति और ऊर्जा प्रदान की। इसकी परिणति देश में क्रांतिकारियों के दल हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन के रूप में हुई। इस दल के नेता अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद थे। इसी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन के प्रमुख  सदस्य थे  सरदार भगत सिंह जिन्हे शहीद-ए-आजम के नाम से जाना जाता है। भगत सिंह ने हिन्दुस्तान के क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा दी, उसमें क्रांति का अर्थ और आशय भरा; जिनकी शहादत ने देश के युवाओं में न केवल आजादी के आन्दोलन के दौरान  देशभक्ति का जज्बा पैदा किया बल्कि वह आज भी युवाओं को प्रेरित कर रहा है।

भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को बंगा, लायलपुर, पंंजाब  (अब पाकिस्तान)  में हुआ था। देशभक्ति उन्हे विरासत में मिली थी। जिस दिन भगत सिंह का जन्म हुआ था उसी दिन उनके पिता सरदार किशन सिंह,  चाचा सरदार अजीत सिंह,  सरदार स्वर्ण सिंह जेल से रिहा हुए थे । इसलिए  उनकी दादी ने उनका नाम भागो वाला रखा जो आगे चल कर भगत सिंह के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनके चाचा सरदार अजीत सिंह और सरदार स्वर्ण सिंह का जुड़ाव क्रांतिकारी आन्दोलन से था। पिता सरदार किशन सिंह कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे।

देशभक्ति भगत सिंह में कूट-कूट कर भरी थी। देश के लिए जीना और मरना उनके जीवन का मकसद हो गया था। देश का राजनैतिक माहौल तेजी से बदल रहा था। तिलक के बाद कांग्रेस की कमान गांधी जी ने संभाली थी। असहयोग आन्दोलन ने आजादी की लड़ाई में जान फूंक दी थी। देश उबाल पर था। इस माहौल में भगत सिंह का तरुण मन भला कैसे चुपचाप बैठे रह सकता था। भगत सिंह इस आंदोलन में शरीक हुए । उन्होने डी ए वी कॉलेज छोड़ कर  नेशनल स्कूल में दाखिला लिया। लेकिन गांधीजी ने अचानक चौरी चौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। पूरा देश गांधी जी के इस फैसले से अवाक, हतप्रभ रह गया। इसका प्रभाव  भगत सिंह के मन पर भी पड़ा। इस अप्रत्याशित घटना ने भगत सिह को क्रांतिकारी आंदोलन की ओर मोड़ दिया।

23 साल की उम्र में देश के लिए हँसते-हँसते फांसी के फंदे को वरण करने वाले भगत सिंह का सपना क्या था?  इस संदर्भ में भगत सिंह का बयान  जो उन्होने  न्यायालय के समक्ष लिखित  रूप से प्रस्तुत किया था गौर करना  प्रासंगिक होगा। “स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का अमिट अधिकार है। प्रत्येक राष्ट्र अपने मूलभूत प्राकृतिक  संसाधनों का स्वामी है। यदि कोई सरकार जनता के मूलभूत अधिकारों से वंचित करती है,तो जनता का केवल अधिकार ही नहीं ,बल्कि कर्तव्य भी बन जाता है कि एेसी सरकारों को समाप्त कर दे।”

स्वतंत्रता जिसे  भगत सिंह प्रत्येक नागरिक का अमिट अधिकार समझते थे, आजादी के 70वें साल देश में इसकी क्या स्थिति है?  आजादी के बाद देश ने वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाया, जिसकी बुनियाद में  समता, स्वतंत्रता और विश्वबंधुत्व के विचार  रहे हैं। इसी के अनुरूप संविधान में प्रत्येक नागरिक को संविधान में  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का  अधिकार  तथा इसकी रक्षा के लिए संवैधानिक उपचार का प्रावधान है। यह बात अवश्य ही महत्त्वपूर्ण है कि पिछले सात दशक से यह प्रणाली देश में सफलतापूर्वक चल रही है। लेकिन लोकतंत्र सिर्फ ढांचे का नाम नहीं है। यह मूल्य, मान्यता और परम्परा से जुड़ा मामला भी है। हाल के वर्षों मे इसमें भारी गिरावट देखने को मिली है। राजनीतिक दल  स्वयं  इसे पूरी तरह अंगीकार करने में सफल नहीं रहे हैं। अब राजनीतिक दलों के मुख्य अध्यक्ष नहीं सुप्रीमो कहे जाते हैं। पूरी शक्ति एक व्यक्ति के हाथ में केन्द्रित होती है। इसमें कोई दल अपवाद नहीं है। यही दल चुनाव जीतकर  राज्य अथवा केन्द्र की सत्ता का संचालन करते हैं, जिसका स्पष्ट प्रभाव शासन- प्रशासन पर लोकतांत्रिक मूल्यों की भारी गिरावट के रूप में देखने को मिलता है।

लोकतंत्र असहमतियों के बीच सहमति बनाकर चलने का भी नाम है। मौजूदा दौर में राजनीतिक दलों एवं संस्थानों में इसकी गुंजाइश बहुत कम , न के बराबर हो गई है। आजादी मिलने  पर जो पहली राष्ट्रीय सरकार बनी उसमे तीन एेसे व्यक्तियों के नाम गांधी जी ने जुड़वाए जिन्होंने आजादी के आंदोलन में अंग्रेजों का साथ दिया था। जब  नेहरूजी ने उनका ध्यान इस ओर दिलाया तो गांधी जी ने जो जवाब दिया ,वह आज भी हमारा मार्ग दर्शन कर सकता है। उन्होंने कहा कि ‘ आप राष्ट्र की सरकार बना रहे हैं या कांग्रेस की?’  आज तो  राजनैतिक दलों / संस्थाओं में कोई सदस्य अलग विचार रखता है तो उसे बाहर का रास्ता दिख दिया जाता है, जिसे कतई लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता।  अभी और कितने सफदर हाशमी, अनिल दाभोलकर,गोविन्द पानेसर और एम एम कलवर्गी को अपने प्राणों की आहुति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए  देनी पड़ेगी। इसमें कोई भी दल अपवाद नहीं है। कभी इन्दिरा इज इन्डिया का नारा लगता था और आज यह कहा जा रहा है कि जो मोदी के साथ नहीं वह देश के खिलाफ है।  अब तो गरीबों के हक में बोलना, विकास नीति या सरकार की नीतियों का विरोध को बिना बहस व सार्थक संवाद के  देशद्रोह करार कर दिया जा रहा है। ग्रीनपीस कार्यकर्ता प्रिया पिलाई को  विदेश जाने से इसलिए रोका गया क्योकि उसने  सरकार की गरीब विरोधी विकास नीति का विरोध किया था  जिसे सरकार ने देशद्रोह माना । बाद में कोर्ट ने सरकार की कार्रवाई को खारिज कर दिया। बिना बहस, संवाद के खारिज करने की प्रवृत्ति मूल रुप से लोकतंत्र विरोधी, फासीवादी है। स्पष्ट है भगत सिंह जिस स्वतंत्रता के अमिट अधिकार की बात करते थे  वह आज भी आम जनता की पहुंच से बहुत दूर है।

भगत सिंह ने कहा था  कि “साम्राज्यवाद मनुष्य के हाथों  मनुष्य, राष्ट्र के हाथों राष्ट्र  के शोषण का चरम है। साम्राज्यवाद अपने हितों और लूटने की योजनाओं को पूरा करने के लिए न सिर्फ न्यायालय या कानून का कत्ल करते है, बल्कि हत्याकाण्ड को आयोजित करते हैं। अपने शोषण को पूरा करने के लिए जंग जैसे खतरनाक अपराध भी करते हैं।”

“हम वर्तमान ढांचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के पक्ष में हैं। हम वर्तमान समाज को पूरे तौर पर  सुसंगत समाज  में बदलना चाहते हैं। …..जब तक सारा सामाजिक ढांचा बदला नहीं जाता और उसके स्थान पर समाजवादी समाज स्थापित नहीं होता, हम महसूस करते हैं कि सारी दुनिया एक तबाह करने वाली प्रलय के संकट में है।”

भगत सिंह साम्राज्यवाद को शोषण का चरम मानते थे। वे मानते थे कि जबतक सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक ढांचे में बुनियादी बदलाव नहीं होता दुनिया एक तबाह करने वाली प्रलय-आपदा में है। आज दुनिया की स्थिति  क्या है? आज साम्राज्यवाद पहले से ज्यादा संकट पूरी  मानव जाति के लिए खड़ा  कर रहा है। साम्राज्यवाद का नया रूप पहले से ज्यादा खतरनाक है। आज साम्राज्यवाद पूरी दुनिया में अपने पंख फैला चुका है। साम्राज्यवाद पहले उपनिवेशवाद के रूप में आया था। आज साम्राज्यवाद बाजारवाद के माध्यम से पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। यह काम साम्राज्यवादी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं विश्वबैंक, मुद्राकोष और विश्वव्यापार संगठन की देख-रेख और मार्गनिदेशन में चल रहा है। उनका लक्ष्य दुनिया के संसाधनों पर कब्जा कर उन्हे अपने बाहुपाश में लेना है। संसाधनों पर कब्जे की इस मुहिम में अफगानिस्तान, इराक, पश्चिम एशिया, अफ्रीका सहित वे भी देश इनकी चपेट में हैं जो गरीब होते हुए भी संसाधनों के मामले में समृद्ध हैं। विश्व व्यापार संगठन के साम्राज्य के आगे राष्ट्रीय सरकारें बेबस हैं और उनकी हैसियत एक चौकीदार से ज्यादा की नहीं रह गई है।

देश की स्थिति पर नजर डालें तो पाते है कि आजादी के बाद के  सत्तर साल के  सफर की जो तस्वीर उभरती है वह बहुत आश्वस्त करने वाली नहीं है। आज विकास के नाम पर हमारी सरकारें साम्राज्यवादी देशों के एजेन्डा को आगे बढाने में लगी हैं। आज गरीब, किसान, मजदूर, आदिवासी को उनके रोजगार, रहवास,खेती, जल, जंगल और जमीन से विकास के नाम पर ।बेदखल किया जा रहा है। आज विकास का मतलब पहाड़ों को खोदना, जंगल को खत्म करना, नदियों को सुखाना, जमीन को बंजर बनाना हो गया है। जो लोग गरीबों की बात करते है, विकास नीति पर सवाल खड़ा करते हैं उसे विकास विरोधी करार देकर सीधे बिना संवाद के खारिज कर दिया जाता है।  इसमें सभी पार्टियां एक साथ हैं। भगत सिंह जिस समाजवादी व्यवस्था को लाना चाहते थे उसमें मुख्य भूमिका किसानों और मजदूरों की मानते थे। मगर आजादी के सात दशक के बाद देश में जो स्थिति पैदा हुई है उसमें खेती घाटे का सौदा बन गया है। किसान कर्ज के चक्र में फंस कर हताश, निराश हो कर आत्महत्या कर रहा है। पूरी दुनिया में यह विकास नीति असफल हो रही है। यूरोप,अमेरिका सभी जगह इसके खिलाफ आवाज मुखर हो रही है। अक्कुपायी द वाल स्ट्रीट, यूरो जोन का संकट स्पेन,ग्रीक, आदि देशों का संकट  इसी ओर इशारा कर रहे हैं। फिर भी हमारी सरकार चेतने के लिए तैयार नहीं है। हमारी सरकारें उसी साम्राज्यवादी देशों की विकास नीति को आगे बढाने में पूरी निष्ठा से लगी हैं जिसके कारण पूरी दुनिया तबाही के कगार पर पहुंच रही है।   यह हमारे  आज के संकट का मुख्य कारण है।

भगत सिंह साम्प्रदायिकता को भी उतनी ही बड़ी दुश्मन मानते थे, जितना साम्राज्यवाद को। भगत सिंह ने जिस  नौजवान सभा  की  संरचना की उसने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव भगत सिंह की अगुआई में पारित किया कि किसी भी धार्मिक संगठन से जुड़े नौजवान  को उसमें शामिल नहीं किया जा सकता क्योकि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है और साम्प्रदायिकता हमारी दुश्मन है जिसका हर हालत में विरोध किया जाना चाहिए।

1919 में जालियांवाला बाग हत्याकाण्ड के बाद ब्रिटिश सरकार ने साम्प्रदायिक दंगों का खूब प्रचार शुरू किया। इसके असर से 1924 में कोहाट में बहुत ही अमानवीय ढंग से हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। उसके बाद राष्ट्रीय राजनीति चेतना में साम्प्रदायिक दंगों पर लम्बी बहस चली। इस मौके पर भगत सिंह ने जो विचार व्यक्त किए वह गौर करने लायक है। “भारतवर्ष की दशा इस समय अत्यन्त दयनीय है । एक धर्म के अनुनायी दूसरे धर्म के अनुयायियों को जान के दुश्मन हैं। …..यह मार-काट इसलिए नहीं है कि फलां आदमी दोषी है, वरना इसलिए कि फलां आदमी हिन्दू है या सिख  है या मुसलमान है। ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य अंधकारमय नजर आता है। इन दंगों ने संसार की नजर में भारत को बदनाम किया है। इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबार का हाथ है।” भगत सिंह लाला लाजपत राय की बहुत इज्जत करते थे। यह मालूम होते ही कि लाला लाजपत राय का रुझान साम्प्रदायिक होने लगा है तो उन्होंने उनकी विचार धारा के खिलाफ एक मुहिम छेड़ दी।…जिसमें बडे- बड़े बैनरों पर लाला जी का चित्र बना कर उन्हे मरा हुआ नेता लिख कर लाहौर में बंटवाया।

आज एक बार फिर देश का साम्प्रदायिक माहौल बिगड़ रहा है। जो काम कभी अंग्रेजी हुकूमत करती थी वही काम इस समय देश का शासकवर्ग कर रहा है। देश का साम्प्रदायिक  वातावरण बिगाड़ने, लोगों को बांटने और शासन करने की साजिशें परवान चढ़ रही हैं ।  ऐसे में भगत सिंह का साम्प्रदायिकता पर स्पष्ट विचार इस घने अंधकार में प्रकाशपुंज की तरह हमारा मार्गदर्शन कर सकता है। आजादी के दौर और उसके बाद के वर्षों में जिस दृष्टि, मूल्य, विचार एवं कार्यक्रम पर राष्ट्रीय सहमति थी उसको चुनौती देने वाली,और राष्ट्र को विपरीत में ले जाने वाली कटिबद्ध ताकतें आज हाशिए से केन्द्र में  आ गई हैं। उग्र राष्ट्रवादी एवं पुनरुत्थानवादी ताकतें आज उभार पर हैं । प्राचीन सभ्यता वाले देशों में भारत ही अकेला है जिसके जीवन में आज भी उसकी पुरानी संस्कृति के उदात्त मानवीय मूल्य एवं समता वाली दृष्टि की छाप मौजूद है। संयम,सहअस्तित्व एवं समन्वय भारतीय संस्कृति की आत्मा है।

देश आज कठिन दौड़ से गुजर रहा है। ऐसे में  समता और न्याय की स्थापना के लिए संघर्षरत  लोगों विशेषकर  युवाओं को भगत सिंह की देशभक्ति, साम्राज्यवाद और साम्प्रदायिकता  के खिलाफ की लड़ाई प्रकाश पुंज की तरह  उनका मार्गदर्शन कर सकता है।

 

अशोक भारत

मो. 8004438413

email : bharatashok@gmail.com

 

संदर्भ :

  • गांधी और भगत सिंह,  ले.  सुजाता,  सर्व सेवा संघ प्रकाशन, राजघाट, वाराणसी
  • भगत सिंह से दोस्ती , सं. विकास नारायण राय, इतिहासबोध प्रकाशन , इलाहाबाद

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