सौ साल पहले चम्पारण का गांधी

चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में प्रकाशित महत्वपूर्ण दस्तावेज एवं संग्रहणीय उपन्यास

ऐतिहासिक घटनाओं और पात्रों पर उपन्यास लेखन रचनाकारों के लिए हमेशा आकर्षण का केन्द्र रहा है। साथ ही ऐतिहासिक घटनाओं एवं पात्रों को सही संदर्भ में प्रस्तुत करना कठिन एवं चुनौतीपूर्ण कार्य है। पंडित राज कुमार शुक्ल के जीवन पर आधारित “सौ साल पहले : चम्पारण का गांधी” उपन्यास में लेखिका सुजाता ने इस चुनौती को बड़ी कुशलता एवं दक्षता के साथ अवसर में बदल दिया है। चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में प्रकाशित यह उपन्यास महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज तो है साथ ही साथ यह इतिहास के उन पात्रों को सामने लाता है जिनके कारण, जिनके अनवरत प्रयास एवं दृढ़ निश्चय के कारण महात्मा गांधी चम्पारण आए। जिनके बारे में महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि "कलकत्ता में भूपेन बाबू के यहाँ मेरे पहुंचने से पहले उन्होने वहाँ डेरा डाल दिया था। इस अपढ़, अनगढ़ परन्तु निश्चयवान किसान ने मुझे जीत लिया।" ऐतिहासिक घटनाक्रम का सिलसिलेवार वर्णन पूर्ण तारतम्यता एवं जीवंतता के साथ इस उपन्यास में देखने को मिलता है। पंडित राज कुमार शुक्ल के संघर्षशील एवं संवेदनशील व्यक्तित्व को जिस संजीदगी से लेखिका ने उभारा है इसके लिए वे बधाई की पात्र हैं।

चम्पारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में मील का पत्थर साबित हुआ। स्वयं महात्मा गांधी ने इसके बारे में आत्मकथा में लिखा, “चम्पारण का यह दिन मेरे जीवन का कभी न भूलने जैसा था। मेरे लिए और किसानों के लिए यह उत्सव का दिन था। सरकारी कानून के अनुसार मुझ पर मुकदमा चलाए जाने वाला था। पर सच पूछा जाय तो मुकदमा सरकार के विरुद्ध था। कमिश्नर ने मेरे विरुद्ध जो जाल बिछाया था, उसमें उसने सरकार को ही फंसा दिया था। मैंने वहाँ ईश्वर का,अहिंसा का और सत्य का साक्षात्कार किया। सारे हिन्दुस्तान को सत्याग्रह अथवा कानून के सविनय भंग का पहला स्थानीय पदार्थ- पाठ मिला। पूरे अखबार में इसकी खूब चर्चा हुई और चम्पारण और मेरी जांच को अनपेक्षित रीति से प्रसिद्धि मिल गयी।”

चम्पारण के रैयतों पर नीलहों के अत्याचार की कोई सीमा न थी। निलहे रैयतों से जबरन नील की खेती करवाते थे। जिसे तीन कठिया व्यवस्था कहा जाता था। चम्पारण में बीस कट्ठे का एक बीघा होता है उसमें से तीन कट्ठे में नील की खेती करना अनिवार्य था। इसके अतिरिक्त तरह तरह के टैक्स रैयतों से वसूला जाता था, जैसे पइन, घोड़ही, भैसही, बंगलही, फगुअही, हवही या मोटरही, बैठ बेगारी, हकजुर्माना और शहरवबेशी आदि। इस अत्याचार के खिलाफ पंडित राज कुमार शुक्ल का मन विद्रोह करता है । इसे समाप्त करने के लिए उनका मन बेचैन रहता है। इसे खत्म कराने के लिए उन्होंने प्रशासन एवं सरकार के दरवाजे खटखटाए परन्तु उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। इसके लिए उस समय के कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं से भी मिले परन्तु वहाँ भी उन्हें सफलता नहीं मिली । मगर दृढ़निश्चयी राज कुमार शुक्ल कहाँ हार मानने वाले थे। उन्होने अपना प्रयास जारी रखा। इस मिशन में शेख गुलाब, शीतल ऱाय, लोमराज सिंह आदि जुड़ गए। अपनी लड़की की शादी के एक दिन पहले निलहे एम्मन ने उनका घर लूट लिया,खेत में लगी फसल को बर्बाद कर दिया। इस अत्याचार के पीड़ादायक अनुभव को सहते हुए भी वे अपने अभियान में लगे रहे। इसी क्रम में वे कानपुर में प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी से मिलते हैं। विद्यार्थीजी उन्हे महात्मा गांधी से मिलने की सलाह देते हैं। यही से शुरू हो जाता है गांधी जी को चम्पारण लाने का प्रयास। इन सारे प्रसंगों का बहुत ही सुन्दर वर्णन इस उपन्यास में प्रस्तुत किया गया है।

श्रद्धा और विश्वास वह पूंजी है जिसकी बुनियाद पर इन्सान असंभव-सा दिखने वाले कार्य को भी संभव बना देता है। राजकुमार शुक्ल को अटल विश्वास था कि गांधी जी चम्पारण अवश्य आएंगे। गणेश शंकर विद्यार्थी ने उन्हे बताया था कि गांधी जी गरीबों के लिए काम करते हैं । उनका यह दृढ़ विश्वास था कि जिस प्रकार भगवान राम के चरण- स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ उसी प्रकार गांधी जी के चम्पारण आने से 19लाख रैयतों( किसानों) का उद्धार होगा। इतिहास यह बतलाता है कि उनका यह विश्वास महज कोरा विश्वास नहीं था वह एक एेसी सच्चाई है जिसकी आज सौ साल बाद पूर देश-दुनिया में चर्चा हो रही है। वे गांधी जी से मिलने साबरमती आश्रम जाते है मगर वहां उनकी मुलाकात नहीं होती है। वे गांधी जी से कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में मिलते हैं। उन्हे रैयतों के दुख दर्द सुनाते हैं । गांधी जी उनकी बात सुनते हैं मगर बिना स्वयं जाने कुछ करने में असमर्थता जाहिर करते हैं। फिर उनकी मुलाकात गांधी जी से कानपुर में होती है। गांधी जी किसानों की स्थिति जानने के लिए चम्पारण आने का आश्वासन देते हैं। अन्तत: 9 अप्रैल 1917 को कोलकत्ता से वे गांधी जी को ले कर चम्पारण आते हैं। निश्चित ही यह राज कुमार शुक्ल के दृढ़ संकल्प शक्ति एवं प्रयास का परिणाम था कि गांधी जी चम्पारण आ सके।

चम्पारण में पं. राजकुमार शुक्ल गरीबों के हितैषी, उनके दुख दर्द में मदद करने वाले और अन्याय, अत्याचार के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज बन गए थे। तभी तो जब लूथरा की पत्नी को नीलहे एम्मन अपने कोठी पर बुला लेता है और इसकी जानकारी जब दासु उन्हे देता है तो एक पल गवाए बगैर एम्मन की कोठी पर धावा बोल लूथरा की बीबी को छुड़वाते है। यह उनके तीक्ष्ण दिमाग, अदम्य साहस और सूझ-बूझ का का परिचायक है। जिस समय नीलहों के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की कोई हिम्मत नहीं करता उस समय वे चम्पारण में प्रतिरोध की आवाज बन कर उभरते हैं,दमन सहते हैं मगर अपना संघर्ष जारी रखते हैं।उनके साहस और संघर्ष का कायल स्वयं नीलहे एम्मन भी था । तभी तो उसने शुक्लजी की मृत्यु के उपरान्त ब्रजकिशोर प्रसांद से कहा था “दुश्मन था पिछले पच्चीस सालों से, बहुत शिद्दत से विरोध करता था, इतना कि मुझे पानी पिला देता था।मैने भी उसे बर्बाद करने के लिए कोई हथकण्डा नहीं छोड़ा। उसके खेत,पशु सभी बिकने पर मजबूर कर दिया। किन्तु वह न भयभीत हुआ न भागा, डटा रहा….। जो गलत लगता था जान जोखिम में डालकर भी डट जाता था जैसे मौत का भय ही नहीं। सच कहूँ कि ब्रजकिशोर प्रसाद चम्पारण का अकेला मर्द था जो हार मानना जानता ही नहीं था। तभी तो मि. गांधी को ले आया।” उनकी संघर्ष गाथा का बहुत ही जीवंत चित्रंण इस उपन्यास में देखने को मिलता है। उनके जीवन के कई छुए-अनछुए पहलुओं से परिचय पाठकों को इस उपन्यास में होता है।

इस उपन्यास में राज कुमार शुक्ल के संघर्ष , चम्पारण सत्याग्रह का विवरण तो मिलता ही है साथ ही साथ महात्मा गांधी के चमत्कारी व्यक्तित्व का भी दर्शन होता है। इसका पहला अनुभव तो शुक्लजी को पटना में ही होता है। जब गांधी जी मजरुल हक के घर पर पहुंचते हैं । गांधी जी को कमरे में सोफे पर बैठा कर और राजकुमार शुक्ल को वरामदे पर कुर्सी पर बैठने के लिए कह कर मजरुल हक उपरी मंजिल पर जाते हैं। वापस आने पर वे गांधी जी को राजकुमार शुक्ल के साथ फर्श पर बैठा पाते हैं। पूछने पर गांधी जी कहते हैं कालीन पर गर्मी लगती है इसलिए फर्श पर बैठा हूँ। उनके हाथ में सिगार होता है। गांधी जी उनसे इसे छोड़ने का अनुरोध करते हैं। इसके जवाब में मजरुल हक न केवल सिगार फेंक कर देते है बल्कि आगे से कालीन का उपयोग बंद करने और खादी पहनने का संकल्प करते हैं ताकि गांधी जी से मित्रता की योग्यता हासिल कर सकें। एक अन्य प्रसंग निलहे हेली का है जिसका उल्लेख करना यहाँ प्रासंगिक होगा। वह हमेशा कहता था कि गांधी अकेले में मिले तो उन्हे मैं गोली मार दूँगा। एक दिन गांधी जी 4 बजे सुबह अकेले उसके घर पहुंच जाते है और उससे गोली मारने को कहते है। हेली ने तो इसकी कल्पना भी नहीं की थी। उसे कुछ भी समझ में नहीं आता है, वह घबरा जाता है। फिर अपने को संभालकर कहता है कि मैंने गोली मारने की बात नहीं कही थी। इस घटना का हेली पर बहुत प्रभाव पड़ा। वह अपने नीलहे मित्रों से कहता है कि उनकी आँखों में मुझे असीसी के दर्शन हुए। इतना ही नहीं वह गांधी जी को विद्यालय खोलने के लिए जमीन का देने का प्रस्ताव करता है। जिस चम्पारण में पं. राजकुमार शुक्ल के पूरे प्रयास के बाद भी कॉग्रेस का कोई बड़ा नेता आने को तैयार नहीं थे गांधी जी के चम्पारण पहुंचने पर वे आने के लिए उत्सुक थे । गांधीजी ने उन्हे तत्काल आने से रोक दिया था। शुक्लजी के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। ऐसे कई प्रसंग इस उपन्यास में पढ़ने को मिलते हैं। इस उपन्यास में राजकुमार शुक्ल के जीवन,चम्पारण सत्याग्रह और गांधी जी के चुम्बकीय व्यक्तित्व को बहुत ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उपन्यास की भाषा सरल एवं प्रवाहपूर्ण है जो पाठक को बांधे रखती है। पंडित राजकुमार शुक्ल जिनके भगीरथ प्रयत्न से चम्पारण में नील का धब्बा धूल सका , भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का स्वर्णिम पन्ना जुड़ा लेकिन इतिहास में उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। सुजाता जी ने इस उपन्यास के माध्यम से इस कमी को पूरा करने का सफल प्रयास किया है। चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में प्रकाशित यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज एवं संग्रहणीय उपन्यास है। उनके इस प्रयास का अभिनन्दन है।

सौ साल पहले चम्पारण का गांधी
ले. सुजाता
वाणी प्रकाशन, नईदिल्ली
मू 495

अशोक भारत
bharatashok @gmail.com , मो. 8004438413

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