महात्मा गांधी : श्रद्धा और पुरूषार्थ का महाकाव्य

गांधी जी का  जीवन श्रद्धा एवं पुरूषार्थ   का महाकाव्य था । श्रद्धा सत्य के लिए और पुरुषार्थ अहिंसा के लिए । गांधी जी ने  एक बड़ा दावा किया था  कि सत्य उन्हें सहज प्राप्त हुआ ,  लेकिन अहिंसा के लिए उन्हें प्रयास करना पड़ा। सत्य  से उनका आशय मन , वचन एवं कर्म की एकता से था। यानी जो मन में है ,वही वाणी में तथा उसी का  कार्य में प्रगट होना। बचपन में उन्होंने  सत्य हरिश्चंद्र नाटक देखा था।  उस नाटक ने उनके बाल मन पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि उनका सारा  जीवन सत्य की साधना में  बीता। अपनी  आत्मकथा को गांधी जी ने सत्य का प्रयोग बताया। जिस सत्य का  उन्होंने प्रतिपादन किया उसको उन्होंने अपने जीवन में पूर्णत:  आत्मसात कर लिया था । उनके लिए सत्य ऐसी विकासशील दृष्टि  बन गया था,जो निरंतर स्पष्ट , प्रेमल  एवं सजीव होती चली जाय।  उनकी जीवन पद्धति , उनका धर्म , उनका दर्शन सब कुछ एक साथ  संगठित और समग्र रूप से उदय हुआ।

गांधीजी के लिए सत्य साध्य और उस साध्य को हासिल करने का साधन अहिंसा  था। गांधीजी अहिंसा में अडिग  विश्वास रखते थे । अहिंसात्मक जीवन से उनका अभिप्राय यह था कि मानवीय संबंधों में किसी प्रकार की सीमाएं जैसे नस्ल,  जाति,  धर्म ,संप्रदाय ,वर्ग आदि  को स्वीकार्य नहीं  किया जाए । आध्यात्मिक प्रगति और विकास के लिए वह आत्मदान  को आवश्यक मानते थे । उनकी मान्यता थी कि उसके द्वारा व्यक्तियों की शक्तियों का चरम विकास होता है तथा समाज की अधिकत्तम सेवा होती है । गांधी जी का जीवन अंतकाल तक अहिंसा की प्रभावशाली शक्ति की खोज , साधना एवं उसके अनुसंधान का निरंतर दीर्घ  क्रम बन गया था । उनका मानना था कि इसे  प्रत्येक मानवीय परिस्थितियों में लागू किया जा सकता है। यह  व्यक्तियों में मानवीय संबंधों , औद्योगिक एवं  राजनीतिक परिस्थितियों का रूपांतरण कर सकता है। यह  निरंकुश शासन को समाप्त कर जनता को स्वतंत्रता एवं न्याय प्रदान कर सकती।  अहिंसा की वास्तविक विजय यह है कि उसे मानने  वाले और जिनके विरुद्ध उसका इस्तेमाल किया जाए अंततोगत्वा उनके भीतर भी आध्यात्मिक परिवर्तन कर सकती  है। गांधीजी जानते थे कि दूषित जीवन में युद्ध के बीज निहित है  और इससे  सभ्यता का सर्वनाश होता है । शांति संपन्न जगत और शांति संपन्न भारत का निर्माण अहिंसक  जीवन से ही संभव है।

युद्ध की जड़े प्रधानत:  लोभ  में निहित है। एक ओर प्रचुरता होते हुए भी  जब दूसरी तरफ निर्धनता एवं जीवन साधन का अभाव होता है तो मत्सर, घृणा तथा शत्रुता पैदा होती है।  इस लोभ  के कारण वर्ग संघर्ष का जन्म होता है । गांधीजी शांति वाद को केवल युद्ध  विरोध की नीति नहीं मानते थे , बल्कि वे  अहिंसा को ऐसा व्यक्तिगत और सामूहिक आचरण का सिद्धांत मानते थे जो युद्ध का अवसर ही उपस्थित न होने देता है। जब तक सामाजिक प्रथाएं,  आदतों का उद्देश्य और  औद्योगिक और व्यापारिक व्यवहार में हिंसा भरी पड़ी है तब तक शस्त्र वाद और युद्ध के विरोध होने वाले आंदोलन बिल्कुल निरर्थक हैं , क्योंकि उनके द्वारा हिंसा के स्थाई स्रोतों को बंद नहीं किया जा सकता । गांधीजी की दृष्टि में अहिंसा एक व्यक्तिगत एवं सामाजिक क्रांति का सिद्धांत है।

गांधीजी पश्चिमी सभ्यता की निंदा प्रधानता इस कारण से करते हैं , क्योंकि वह व्यक्तिगत संपत्ति और शक्ति के लिए मनुष्य को यंत्र के समान बना  कर माननीय श्रम का शोषण करती है।  इसके परिणाम स्वरूप एक ऐसा समाज  उत्पन्न होता हो जाता है जिसमें  परस्पर विरोधी वर्ग अपने  विरोधी आदर्शों के लिए हिंसक क्रांति एवं प्रति क्रांति में जुटे रहते हैं । इस पदार्थवाद  से वस्तुओं और सेवाओं के निरंतर बढ़ती हुई मांग पैदा होती है तथा उसके कारण संसार के बाजारों और पूर्ति के लिए भयंकर स्पर्धा, अंतरराष्ट्रीय तनाव और अंत में युद्ध का जन्म होता है।

इसलिए गांधीजी चाहते थे भारत को पश्चिमी  पद्धति के उद्योगिक मार्ग का अनुगमन नहीं करना चाहिए , बल्कि उसे मानवीय व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा , प्रत्येक व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास तथा एक सुंदर संस्कृति एवं स्वस्थ जीवन पद्धति के निर्माण के लिए कार्य  करना चाहिए । इन लक्ष्यों की प्राप्ति  छोटे समुदायों में ही हो सकती , जिन्हें वे ग्राम गणराज्य कहते थे। यह अहिंसक  समाज होगा जिसमें शांति की प्रतिष्ठा एक जीवन पद्धति के रूप में स्थापित होगा ।

लेकिन आजादी के बाद देश गांधी जी के बताए रास्ते को छोड़ भोग पर आधारित  पश्चिमी विकास के मॉडल को  अपनाया । जिसका परिणाम यह हुआ कि एक तरफ आर्थिक विषमता काफी बढ़ गई ,  दूसरी तरफ  देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं किसान आज गहरे संकट में  है। देश हिंसा , आतंकवाद की गंभीर चुनौती से जूझ रहा है । देश में बढ रहे भ्रटाचार एवं नैतिक मूल्यों भारी गिरावट हम सब के चिंता के कारण बन रहे हैं। भ्रटाचार की जांच करनेवाली देश की शीर्ष संस्थाएं भी भ्रटाचार के आरोपों से मुक्त नहीं हैं। इसलिए गांधी जी की विचारों का पुर्नपाठ आज आवश्यक है।   बा – बापू –  150 एक अवसर  है कि गांधीजी के विचारों को अपनाने , आत्मसात करने का ,ताकि देश तथा जगत में स्थाई शांति कायम की जा सके।

-अशोक भारत

मो. 9430918152

e-mail – bharatashok@gmail.com

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