बिहार में पाला-बदल के निहितार्थ

– अशोक भारत

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 26 जुलाई को इस्तीफा दे कर  राज्य में महागठबंधन की सरकार का अंत कर दिया।  24 घंटे के अंदर ही भाजपा के साथ मिलकर  छठी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली एवं राज्य में एन डी ए की सरकार की गठन का मार्ग प्रशस्त किया। इस्तीफे के बाद उन्होने कहा कि राज्य में काम करना मुश्किल हो गया था। इसलिए अंतरात्मा की आवाज पर इस्तीफा दिया है।  लालू प्रसाद के पुत्र एवं  राज्य के उपमुख्यमंत्री  तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप और सी बी आई द्वारा मुकदमा दायर करने के कारण महागठबंधन में दरार पड़ गयी थी। मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का इस्तीफा चाहते थे। लेकिन उन्होने इस्तीफा देने  से मना कर दिया। जिसका पटाक्षेप राज्य में महागठबंधन की सरकार का खात्मा और एन डी ए सरकार की वापसी के रूप में हुआ।

वैसे देखा जाय तो सुविधा की राजनीति को सिद्धांत की चासनी में डूबो कर प्रस्तुत करने में नीतीश कुमार चैम्पियन बन कर उभरे हैं। 2013 में  उन्होने साम्प्रदायिकता पर जीरो टॉलरेन्स को आधार बना कर एन डी ए से नाता तोड़ा  था। तब से 26 जुलाई 2017 तक लालू प्रसाद की मदद से सरकार चलाते रहे हैं , पहले बाहर से समर्थन ले कर और बाद में महागठबंधन बनाकर । और अब  भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेन्स का हवाला दे कर महागठबंधन को तोड़कर एन डी में वापसी  की है। यहाँ एक बात गौर करने लायक है  कि 2013 की तुलना में देश का  साम्प्रदायिक माहौल  बिगड़ा ही है।

इस बात का संदेह शायद ही किसी को हो सकता है कि यह सब अचानक घटा। दरअसल राजनीतिक हलको में इस बात की जानकारी लगभग 6 महीने पहले हो चुकी थी कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एन डी ए में शामिल होने का मन बना चुके है। बस उन्हें सही वक्त का इन्तजार था जो उन्हें सी बी आई द्वारा तेजस्वी यादव पर मुकदमा दायर करने के कारण मिल गया। नीतीश कुमार पिछले 12 वर्षों से राज्य में मुख्यमंत्री हैं। उन्हें राजनीति के चतुर खिलाड़ी और सही राजनीतिक फैसले लेने के लिए जाना जाता है। उनकी छवि स्वच्छ एवं ईमानदार राजनीतिक की रही है। मुख्यमंत्री के इस राजनीतिक फैसले का निहितार्थ क्या है? उनके इस फैसले का राज्य और देश की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

नीतीश कुमार के एन डी ए में शामिल होने के फैसले का पार्टी में विरोध हो रहा है। पार्टी के  कई वरिष्ठ नेता और सांसद नीतीश कुमार के इस फैसले के खिलाफ हैं। उन्होने अपना विरोध सार्वजनिक भी कर दिया है। अब यह मुख्यमंत्री के राजनीतिक कौशल की परीक्षा  होगी कि  वे इस विरोध को समाप्त करने में कामयाब होते हैं या नहीं। यदि इस विरोध को वे नजरअंदाज करते हैं या कोई कारगर समाधान निकालने में विफल  रहते हैं तो तत्काल भले ही उन्हे कोई परेशानी नहीं हो लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव अवश्य पड़ेगा, जिन्हे नजरअंदाज करना एक  राजनीतिक जोखिम होगा। एन डी ए में शामिल होने से उन्हे केन्द्र से मदद मिलना सुगम हो जायेगा जिससे आगे की राजनीतिक सफर आसान हो सकता है।  लेकिन राजनीति की गाड़ी इतनी सरपट नहीं चलती।  यह बात समझी जा सकती है जितना नीतीश कुमार को भाजपा की जरूरत थी उससे कहीं ज्यादा भाजपा को नीतीश कुमार की आवश्यकता है। पिछले विधान सभा चुनाव में यह स्पष्ट हो गया कि राज्य में जब तक महागठबंधन कायम है भाजपा का अकेले अपने दम पर चुनाव जीतना संभव नहीं है। पार्टी के सामने 2019 में लोक सभा का चुनाव है और बिहार एवं उ प्र के पास दिल्ली की सत्ता की कुंजी है। उ प्र का किला फतह करने के बाद अंतिम रोड़ा महागठबंधन की सरकार  बिहार में थी जिसे तोड़ने में भाजपा सफल रही है।

लेकिन यह देखना रोचक होगा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अल्पसंख्यकों में अपना जनाधार, जिसमें उनकी अच्छी पकड़ है, कायम रखने में कामयाब रहते है कि नहीं । अगर वे अपना परम्परागत वोट अल्पसंख्यकों एवं दलितों में कायम रख पाते हैं तो आगे का राजनीतिक सफर सुगम हो सकता है। एक बात यहाँ गौर करने लायक है कि एन डी ए का मौजूदा दौर वह नहीं जो कभी अटल बिहारी वाजपेयी के समय हुआ करता था। बी जे पी को केन्द्र में स्पष्ट जनादेश मिलने और अनेक राज्यों में सरकार के कारण इस समय पार्टी  हिन्दू राष्ट्र बनाने के एजेंडेे पर बहुत आक्रामक तरीके से आगे बढ रही है। तथाकथित गौरक्षकों का  एक समुदाय विशेष को निशाना बनाना , योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाना इसी ओर इशारा करते हैं। योगी आदित्यनाथ के खिलाफ न्यायालय में कई आपराधिक मामले लंबित है फिर भी पार्टी ने उन्हे मुख्यमंत्री बना कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह हिन्दू राष्ट्र बनाने के एजेंडे पर गम्भीर है।  योगी आदित्यनाथ की छवि आक्रामक हिन्दुत्ववादी नेता की रही है और पार्टी उसे भुनाना चाहती है।

हिन्दू राष्ट्र बनाने का विचार संविधान और देश की आत्मा दोनो के खिलाफ है। संयम, सादगी, बहुलतावादी स्वरूप और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व देश की आत्मा है। तथाकथित गौरक्षकों की फौज को नीतीश कुमार को नियंत्रण में रख पाना आसान नहीं होगा। राज्य में एन डी ए की सरकार के बनने के बाद उनके हौसले बुलंद हैं। उन्हे नियंत्रण में रखना मुख्यमंत्री के लिए एक चुनौती होगी। स्वंयं प्रधानमंत्री इन तथाकथित गौरक्षकों के खिलाफ संसद और संसद के बाहर बयान दे चुके हैं। मगर उसका कोई प्रभाव कथाकथित गौरक्षकों की आक्रामकता में कमी के रूप में  अभी तक देखने को नहीं मिला है।

देश में अल्पसंख्यक दहशत में जी रहे हैं। यह स्थिति किसी भी देश के लिए ठीक नहीं है  चाहे जिस पार्टी की सरकार है उसे संविधान के अनुसार ही चलना होगा। यह न्यूनतम शर्त है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं हैं। नीतीश कुमार के एन डी ए में शामिल होने से राज्य में वोटों का नए सिरे से ध्रुवीकरण अनिवार्य है। नीतीश कुमार के एन डी ए में शामिल होने से एन डी ए विरोधी मतों को एकजूट करने का एक मौका भी है । यह बात सही है कि लालू प्रसाद इस समय सबसे कठिन राजनैतिक चुनौती का सामना कर रहे हैं। वे भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी पाए गए हैं।  उनके चुनाव लड़ने पर   प्रतिबंध है। उनके परिवार के अन्य सदस्य भी भ्रष्टाचार के आरोप का सामना कर रहें हैं। उनपर सीबीआई द्वारा मुकदमा दायर किया गया है । केन्द्र और राज्य में उनके प्रतिकूल सरकारें हैं। इस विपरीत परिस्थिति में लालू  प्रसाद का रास्ता बहुत कठिन है।

मगर लालू प्रसाद एक जनाधार वाले नेता हैं पिछले  लोकसभा चुनाव में वे दूसरे स्थान पर रहे थे। नीतीश कुमार की पार्टी जदयू तीसरे स्थान पर थी और राज्य की आधी से अधिक सीटों पर मुकाबले से बाहर थी। तब से देश की स्थिति काफी बदली है। लालू प्रसाद अगर परिवादवाद की मोह  से बाहर निकलते हैं तो उनके पास योग्य नेताओं की कमी नहीं है जो इस चुनौती को अवसर में बदलने की क्षमता रखते हैं।  वे गैर एन डी ए मतों को एकजूट कर सकते हैं  और राज्य और देश के लिए संभावना पैदा कर सकते हैं। बड़ा सवाल यही है  लालू प्रसाद इसके लिए तैयार हैं क्या? इसके लिए परिवार के घरौंदे से बाहर  बड़े कैनवास पर सोचना एवं कार्य करना होगा। आज की चुनौती नई है। इसमें पुराने नुस्खे से काम नहीं चलेगा। देश नई  राजनीति की प्रतीक्षा में है।

अशोक भारत

मो. 8004438413

bharatashok@gmail.com

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