ज्यों ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया

देश के कई राज्यों विशेषकर पूरब के राज्यों- असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि में बाढ़ की स्थिति गम्भीर बनी हुई है। असम और पश्चिम बंगाल की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है, मगर बिहार और उत्तर प्रदेश में स्थिति अब भी गम्भीर बनी हुई है।

बिहार में बाढ़ ने अब विकराल रूप धारण कर लिया है। भयंकर तबाही हुई है। अभी तक राज्य के 19 जिलों के 1.67 करोड़ से ज्यादा आबादी प्रभावित है। अब तक 400 से ज्यादा जान जाने की खबर है। मरने वालों की संख्या में रोजाना बढ़ोत्तरी हो रही है। सबसे ज्यादा 87 लोगों की जान अररिया जिले में गयी है। यह संख्या ज्यादा भी हो सकती है। राहत और बचाव कार्य में सरकार की तरफ से एनडीआरएफ के 27, एसडीआरएफ की 15 और सेना की 6 टीमें लगी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 7 लाख 61 हजार से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया गया। 1085 राहत शिविर लगाए गए हैं और 1608 सामूहिक भोजनालय चलाए गए। राहत कार्य में नागरिक पहल भी हो रही है फिर भी धरातल पर त्राहिमान है। 2007 के बाद सबसे विनाशकारी बाढ़ का सामना राज्य कर रहा है।

 

हर साल आती बाढ :

बिहार में बाढ़ तकरीबन हर वर्ष आती है और थोड़ा बहुत बर्बादी अपने साथ लाती है। लेकिन बीच-बीच में बड़ी बाढ़ें आती हैं जिनके साथ भारी तबाही और बर्बादी आती है। हाल के वर्षों में अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें तो पाते हैं कि 1987, 2004 और 2007 में बड़ी बाढ़े आई थी। वर्ष 2008 में कोसी की धारा बदलने से आई बाढ़ अलग किस्म की थी, उसे हमने इस सूची में नहीं रखा है। लेकिन इस वर्ष बाढ़ कुछ इलाकों में पिछले रिकॉर्डों से कहीं अधिक मारक साबित हुई है। उत्तरी और पूर्वी इलाकों में बाढ़ का असर कुछ अधिक ही रहा है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2016 में बिहार में बाढ़ से 20 जिले के 23 लाख की आबादी प्रभावित हुई थी और 250 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। 2013 में जुलाई के महीने में आई बाढ़ में 200 से ज्यादा जानें गई। बाढ़ से राज्य के 20 जिले की 50 लाख की आबादी प्रभावित हुई। सन 2011 में बाढ़ से 71,45,000 की आबादी प्रभावित हुई। इसमें 249 जानें गई और 1.5 करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ। 2008 में बिहार के 18 जिले के 50 लाख आबादी बाढ़ के चपेट में आई। 2007 में 22 जिलों के 2.4 करोड़ की आबादी बाढ़ से प्रभावित हुई जिसमें 1287 जानें गई। 2400 जानवर भी मरे और 1 करोड़ हेक्टेयर की खेती भी बुरी तरह प्रभावित हुई। 2004 में राज्य के 20 जिले के 9346 गाँवों के दो करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए। 850 लोगों और 3272 जानवरों की मौत हुई। 522 करोड़ के फसल का भी नुकसान हुआ। 2002 में राज्य के 25 जिले बाढ़ से प्रभावित हुए। इसमें 489 मौतें हुई और 8318 गाँव इसकी चपेट में आए। 511 करोड़ की फसल का भी नुकसान हुआ। 2000 में राज्य के 33 जिले बाढ़ से प्रभावित हुए। बाढ़ के कारण 336 लोगों की जान गई। इसके अलावा 83 करोड़ की फसल का भी नुकसान हुआ। 1987 में 30 जिले बाढ़ की चपेट में आई थी। इसमें 24518 गाँव बाढ़ से प्रभावित हुए थे और 1399 लोगों की मौत हुई। 5000 से ज्यादा जानवर भी मारे गए। 678 करोड़ की फसल भी बर्बाद हुई।

तटबंधों में कैद जिंदगी :

बाढ़ से तबाही का आलम यह है कि सुपौल जिले में कोसी तटबंध के बीच में बसर करने वाले लोगों को, हर साल बरसात के समय ऊँची स्थानों पर शरण लेनी पड़ती है, हर दूसरे तीसरे साल नई जगह बसना पड़ता है। मना टोला खोखनाहा गाँव के 60 वर्षीय श्री प्रसाद सिंह कहते हैं कि अब तक 16 बार अपना नई जगह घर बसाना पड़ा है। पहले गाँव सहरसा जिला में था, बाद में मरौना प्रखंड और फिलहाल किशनपुर प्रखंसुपौल जिला में है।

सरकारी प्रयासों के उलटे प्रभाव :

बाढ़ की समस्या के समाधान के लिये सरकारें लगातार प्रयत्नशील दिखती हैं। सरकार ने बाढ़ नियंत्रण विभाग बनाया है। अब आपदा प्रबंधन विभाग भी कार्य कर रहा है। इस पर अब तक अरबों रुपये खर्च भी हुए हैं। मगर साल-दर-साल लोगों को भीषण से भीषमतम तबाही का सामना करना पड़ रहा है। करोड़ों की फसल बर्बाद होती है, हजारों गाँव तबाह होते हैं । बड़ी संख्या में आदमी और जानवरों की जान गवानी पड़ती है। सरकारी प्रयासों के बावजूद साल-दर-साल राज्य में बाढ़ क्षेत्र में इजाफा हो रहा है। 1952 में बिहार में 25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ प्रवण हुआ करता था जो अब बढ़कर 73 लाख हेक्टेयर हो गया है। यह हालत केवल बिहार की नहीं है। देश भर में यही हाल है। देश के स्तर पर देखें तो 1952 में 2.5 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ प्रवण था जो अब बढ़कर 5 करोड़ हेक्टेयर हो गया है। यानी कि ज्यों ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता ही गया। स्पष्ट है सरकार के बाढ़ नियंत्रण के कार्यक्रम में कुछ न कु गड़बड़ी है।

तटबंध बाढ़ का समाधान नहीं :

दरअसल तटबंध बनाना बाढ़ की समस्या का समाधान नहीं है। यह अब खुद समस्या बन गया है। लेकिन सरकारी महकमे के पास बाढ़ का इकलौता समाधान तटबंध है। वह बाढ़ नियंत्रण के नाम पर तटबंध बनाने और उसे बचाने में ही व्यस्त रहती है। जबकि तटबंध स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल कतई नहीं हैं।

 

असल में गंगा का पूरा मैदानी इलाका बाढ़ द्वारा लाई गई मिट्टी से बना है। जब तटबंध नहीं होता था तो बाढ़ में नदी अपने साथ उपजाऊ मिट्टी खेतों में पहुँचा देती थी जिससे खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती थी और फसल खूब अच्छी होती थी, किसानों को लाभ होता था। फिर बाढ़ का पानी ढाई दिन में उतर भी जाता था। बाढ़ से नदी की उडाही भी होती थी जिससे नदी गहरी हो जाती थी। बाढ़ से तालाब पोखर, ताल तलैया भर जाते थे जिससे गैर मानसून के महीने में उस पानी का उपयोग खेती व अन्य कार्यों के लिये होता था। अब तटबंध के कारण नदी की लायी गाद बाहर नहीं जा पाती, नदी के पेट में ही रह जाती है। अब गाद भरने से नदी की गहराई कम हो रही है। इससे नदी का जलधारण क्षमता कम हुआ है और बाढ़ के समय पानी चौड़ाई में फैलती है और बाढ़ क्षेत्र का विस्तार होता है।

अब तटबंध के कारण कीमती उपजाऊ मिट्टी खेतों में नहीं पहुँच रही है, इससे खेतों की उर्वरा शक्ति भी प्रभावित हो रही है तथा रासायनिक खाद एवं कीटनाशक पर निर्भरता बढ़ रही है। सड़कों (राष्ट्रीय एवं राज्य मार्ग) एवं रेल मार्ग के विस्तार के कारण पानी के नैसर्गिक निकासी का मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं। मानसून में जब पानी का प्रवाह बहुत बढ़ जाता है तो तटबंध, सड़कें एवं रेलमार्ग पर काफी दबाव पड़ता है। अत्यधिक पानी के दबाव के कारण तटबंध, सड़क और रेल मार्ग ध्वस्त हो जाते हैं जिससे जान-माल की भारी तबाही होती है। राज्य में 2007 के बाढ़ में 32 जगहों पर तटबंधों में दरारें पड़ गई थी, 783 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय एवं राज्य मार्ग को बंद करना पड़ा था, क्योंकि वह 54 स्थानों पर टूट गए थे। 3194 किलोमीटर ग्रामीण सड़कें भी तहस-नहस हो गई थी।

अतिथि नहीं है बाढ़ :

इस संदर्भ में प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र जी का बयान गौर करने लायक है। वह कहते थे कि बाढ़ हमारे अतिथि हैं, उनके आने की तिथि निर्धारित है लेकिन हम उसकी तैयारी नहीं करते। इस वाक्य में छिपा है समाधान के सूत्र। लेकिन हमारी वर्चस्ववादी मानसिकता के कारण यह संकट गहराता जा रहा है। हम प्रकृति के साथ जीने के बजाय प्रकृति पर विजय प्राप्त करने, उसे अपने नियंत्रण में रखने पर ज्यादा भरोसा करने लगे हैं जो समस्या की जड़ है। नदी मामलों के जानकार एवं गंगा मुक्ति आंदोलन के नेता अनिल प्रकाश कहते हैं कि बाढ़ नियंत्रण का कांसेप्ट ही गलत है इसकी जगह बाढ़ प्रबंधन का काम होना चाहिए। नदियों को अविरल बहने देना चाहिए और जहाँ अवरोध हो उसे हटाना चाहिए। यह बेसिक कांसेप्ट अपनाना चाहिए, तटबंध बनाना कहीं से भी उचित नहीं है। यह सुरक्षा का भ्रम पैदा करते हैं।

विनाशकारी होगी नदी जोड़ :

नदियों का अपना स्वाभाविक ढाल होता है जिसे वह अपने आप पकड़ती है और इसके इर्द-गिर्द के इलाके को खुशहाल बनाते हुए आगे बढ़ती है। नदियों में ऐसे कई उदाहरण हैं जो बताते हैं कि नदियों के पानी की दिशा नहरों द्वारा बदली गई है तो वे भारी तबाही के कारण बने, जैसे उत्तर प्रदेश का शारदा नहर और बिहार का कोसी तटबंध आदि। नदी कोई रेल नहीं है जिसे दो पटरियों के बीच चलाया जाय। अभी केन्द्र सरकार नदी जोड़ योजना को लागू करना चाहती है। इसके परिणाम विनाशकारी साबित होंगे। कोसी नदी पहले वीरपुर, छातापुर होकर बहती थी, बाद में तटबंध बनने के कारण वह अब सहरसा, खगड़िया होकर बहती है। उल्लेखनीय है कि 2008 में कुशहा बाँध टूटने के बाद नदी ने उसी मार्ग का अनुसरण किया जिस हो कर वह पहले बहती थी। इस तटबंध के टूटने से क्षेत्र में भारी तबाही हुई थी। 700 से ज्यादा गाँव बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुए। हजारों जानें गई थी और सड़क और रेल मार्ग सब ध्वस्त हो गए थे।

नदी के विज्ञान को समझना :

हमारे पुरखों एवं परम्परा ने हमें प्रकृति, नदियों के साथ जीने का वैज्ञानिक तरीका सिखाया है। मगर वर्चस्ववादी मानसिकता में हम इसे आपदा मानने लगे हैं और बाढ़ नियंत्रण की योजना बनाते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि हम प्रकृति के हिस्सा हैं। इसके साथ संगति बैठा कर जीने में ही भला है वरना विनाश को निमंत्रण देना है। यह आज के संकट की जड़ है। हमें अपनी सोच में बदलाव कर विज्ञान सम्मत समाधान ढूंढना होगा। समाधान का रास्ता नदियों की अविरलता एवं उसके प्रवाह के मार्ग में रुकावट को दूर करने के प्रयास के तरफ से होकर गुजरता है। नीति निर्धारकों को यह बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिये।

 

– अशोक भारत

मो. 9430918152,

ईमेल – bharatashok@gmail.com

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